Tuesday, August 3, 2010

मन मयूरा


मन मयूरा थक रहा बादल घनघोर
आँखें देखती इस ओर तो कभी उस ओर

गरजती हुई घटा और चमकती सी बिजली
उस पर फिर चलते हुए पवन का शोर
व्याकुल ह्रदय एक ख्वाहिश संजोती रही
कि रिमझिम बूँदें बरसें इस छोर

साथ बारिश के बादल भी खींच लूं
अगर बना लूं अम्बर से धरती तक डोर

हौले- हौले टपकती मोतियों सी बूँदें
ये मौसम बन रहा धरती का सिरमौर

हर्षित हो कर नृत्य में मग्न हूँ
समस्त वातावरण हुआ आनंद विभोर
यह रचना हमारे एक मित्र नईम जी के ब्लॉग "हज़ार अशार" से ली गई है...
(
http://nayeemnahi.blogspot.com/)

10 comments:

आशीष मिश्रा said...

बहोत अच्छी रचना

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

संजय भास्कर said...

मन मयूरा नाच रहा है क्या ?

संजय भास्कर said...

बड़ी रूमानी कविता है जिसकी हर पंक्ति में एक सुंदर सा बिम्ब झांकता है

संजय भास्कर said...

अति सुन्दर, Roshani जी.वैसे तो हमेशा ही आपकी अभिव्यक्ति काफी अच्छी होती है पर यह तो सचमुच कमाल की है.

Udan Tashtari said...

रचना अच्छी लगी.

Roshani said...

Aabhar.
is tareef ke sahi hakdar Naeem ji hain jinhone mujhe is rachna ko pradrshit karne ka mouka diya.

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सुरेश यादव said...

वाह रोशनी जी,
साथ बारिश के बादल भी खींच लूँ
अगर बनालूं अम्बर सेधरती तक डोर
सार्थक अभिव्यक्ति के लिए बधाई.

Anonymous said...

ek umda post....

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