Friday, September 17, 2010

कल्याणी माता कर्मा

झाँसी की धरती ने देश को बहुत कुछ दिया है. जो आज हमारे लिए स्मरणीय है और वंदनीय भी, इसी झाँसी ने आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व सम्पूर्ण तैलीय वैश्य समाज को एक कल्याणी माँ भी प्रदान किया. धन्य है झाँसी और धन्य है झाँसी की उर्वरा धरती.
झाँसी में बहुत ही संपन्न तैलकार रहा करते थे. जिनका नाम राम शाह था. उनका तेल का व्यवसाय अपनी चरम पर था. व्यवसाय के बाद सारा समय भजन पूजन यज्ञ आदि में वे लगाया करते थे क्योंकि वे जानते थे कि ईश्वर ने उन्हें जितनी विभूतियाँ दी हैं वे रामशाह के लिए नहीं वरण समस्त मानवता के लिए है. उनका सम्पूर्ण जीवन सत्कर्मों को समर्पित था. फिर भी रामशाह के जीवन का एक कोना बड़ा उदास था. उनके कोई संतान न थी लेकिन ईश्वर सबकी मनोकामना पूरी करते हैं आखिर एक दिन वह घड़ी भी आई संमत १०७३ के चैत्र कृष्ण पक्ष ११ को एक कन्या रत्न ने जन्म लिया नामकरण की बेला आई, रामशाह ने अपना निर्णय सुनाया कि मुझे यह बेटी मिली है इसलिए मै उनका नाम कर्मा रखूँगा. चन्द्रमा की सोलह कलाओं की तरह कर्म उम्र की सीढ़ियाँ देखते ही देखते पार कर गई. परिवार का धार्मिक संस्कार तो उन्हें मिला ही था इसलिए बचपने से ही भगवन जगदीश के भजन पूजन आराधना में उन्हें विशेष आनंद मिलता था.
पूर्ण -वय प्राप्त हो जाने पर कर्मा के हाथ पीले करने की धुन रामशाह को सवार हुई. ग्वालियर राज्य के नरवर के एक समृद्ध तैलकार परिवार में कर्मा की डोली पहुंची तब तक कर्मा की साधना की ख्याति झाँसी जनपद की सीमाओं को लाँघ चुकी थी. कर्मा सु- दर्शन और धनधान्य से संपन्न पति पाकर बहुत प्रसन्न तो थी लेकिन पति की आमोद प्रमोद प्रियता से किंचित दुखी रहती थी.
हमेशा की तरह वे एक दिन घर कार्य से निपट कर भगवान मुरली मनोहर को अपने स्मृति पर ला रही थी. उनके पति ने रुष्ठ स्वर में कहा- कर्मा मैं साफ़ साफ़ जानना चाहता हूँ की तुम्हें किसमें अधिक सुख मिलता है? बड़े ही शांत स्वर में कर्मा जी ने कहा-"मुझे वही काम करने में सुख मिलता है जिनसे आप प्रसन्न रहे. यही मेरा सबसे बड़ा धर्म भी है. इस धर्म की कीमत चुकाने के बाद ही और बातें आप ही आप मिल जाती हैं......" यह सोचकर कि मेरे पतिदेव मेरे उत्तर से संतुष्ट हो गए हैं कर्मा जी ने आँखें बंद कर ली और ईश्वर में धयानस्थ हो गईं. कर्मा जी के पति के मन में आया कि इनकी जरा परीक्षा ली जाये और उन्होंने भगवान कृष्ण की मूर्ति को छिपाकर अन्यत्र रखी ही थी कि आँख बंद किये ही कर्मा जी ने कहा- "ऐसे क्यों अनर्थ करते हैं प्रिये! भगवान कि प्रतिमा को उसकी ठौर में ही रख दे!" पति अवाक् थे ! उन्होंने मूर्ति जहाँ की तहां रख दी. अब उनके मन की शंका निर्मूल हुई और कर्मा की साधन के प्रति न उनका अनुराग बढ़ा अपितु उनका ह्रदय ही बदल गया. ईश्वरराधाना की ओर वे प्रवृत्त हुए. यह कर्मा की पहली जीत थी.
इसके बाद दंपत्ति युगल एक दुसरे की मनोभावना को समझते हुए प्रेम के साथ कालयापन करने लगे. कालक्रम में कर्मा माता की कोक से एक पुत्र रत्न ने जन्म लिया. कर्मा माता का मातृत्व धन्य हो गया ऐसे माहोल में कर्मा माता की परीक्षा की दूसरी घड़ी आयी .......
नरवर नरेश के प्रिय सवारी हाथी को असाध्य खुजली का रोग हो गया. राजवैद्य की नाड़ी ठंडी हो गई, रोग जाने का नाम नहीं लेता था. किसी दुष्ट ने कह दिया कि कुंड भर तेल से यदि हाथी को स्नान कराया जाये तो उसकी खुजली मिट सकती है इसमें कोई संदेह नहीं कि तेल को परम औषधि का दर्जा मिला हुआ भी है. राजा के दिमाग में यह बात चढ़ गई, पर इतना तेल कहाँ से आये? देखि न जाये पराई विभूति ऐसे लोगों की कमी किसी युग में नहीं रही किसी कलंकी ने कह दिया कि नरवर राज्य भर के तैलकारों को कुंड भरने कि राजाज्ञा प्रसारित होनी चाहिए. निदान ऐसा ही हुआ. साफ़ है कि बहुत बुरा हुआ. महीने भर तक कुंड भरा ही न जा सका. समस्त तैलिक वैश्य परिवार के सामने जीवन मरण, रोजी-रोटी का प्रश्न खड़ा हो गया. नरवर एक जागरूक सामाजिक नेता होने के नाते कर्मा के पति का चिंतित होना आवश्यक था. पति की इच्छा जन भक्त कर्मा ने प्रभु की तेरा- अंतरात्मा की पूरी आवाज उन्होंने लगा दी. तभी भक्त कर्मा के कर्ण-रंध्रों में भगवान की वाणी गूंजी.
यदा यदा ही धर्मस्य, ग्लानिर्भवती भारत.
अभ्युथानंधर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्यहम
परित्राणाय साधुनां, विनाशाय च दुष्कृताम
धर्म संस्थापनार्थाय, संभवामि युगे युगे
और सचमुच भगवान की लीला अपरम्पार होती है। दूसरे ही दिन यह बात सारे नगर में आग की तरह फ़ैल गई कि कुण्ड भर गया। लोगों के लिए तमाशा था लेकिनसमझदारों ने भक्त कर्मा कि जय जय कर से सारा आकाश गूंजा दिया। सारे तैलिक वैश्य समाज को महासंकट से छुटकारा मिला। भक्त कर्मा की ख्याति इस घटना से देश भर में फ़ैलने लगी। भक्त कर्मा ने पति से निवेदन किया कि हम इस नर पिशाच राजा के राज में देर तक ना रहें। निर्णय लेने भर की देर थी कि नरवर का सारातैलिक वैश्य समाज एक बारगी उठकर झाँसी चला आया।
पुण्य भूमि झाँसी तुम्हें एक बार फिर प्रणाम करूँ तब आगे कि कथा कहूँ। बहुत काल झाँसी में व्यतीत हुआ। भक्त कर्मा कि आस्था भगवान पर दृढ़ से दृढ़त्तर होतीगई। विधि का विधान किसने देखा है। कर्मा के तो भाग ही फूट गए.....
थोड़े समय की अस्वस्थता के बाद उनके पति का निधन हो गया। सारा झाँसी तैलिक समाज गहन शोक में डूब गया। भक्त कर्मा बिलखती ही रह गई और तत्कालीनप्रथा के अनुसार पति की चिता में ही आत्मदाह करने का संकल्प कर लिया। इसी समय आकाश वाणी हुई "यह ठीक नहीं बेटी! तुम्हारे गर्भ में एक शिशु पल रहा है -वक्त का इंतजार करो मै तुम्हें जग्गंनाथ पुरी में दर्शन दूंगा। " भक्त कर्मा ईश्वरीय आदेश का उल्लंघन कैसे करें।
"समय जात नहिं लागहिं बार" तीन चार वर्ष बच्चों के लालन पालन में ही लग गए। भक्त कर्मा का मन आकाशवाणी की ओर बारम्बार जाता कि भगवान के दर्शनमुझे कब होंगे? अब भक्त कर्मा के लिए कोई भी ऐसा लौलिक आकर्षण बाकि नहीं रह गया जो अपनी मायाजाल में बांध कर रख सके। निदान एक रात भयानकसन्नाटे में ही भगवान को भोग लगाने के लिए कुछ खिचड़ी रखकर वे पुरी के लिए अकेली पैदल निकल पड़ी। भक्त कर्मा कि सूझ-बुझ नहीं रही चलते चलते थककरएक वृक्ष की छायामें दूसरे दिन विश्राम करने लगी, आँख लग गई और जगी तो अपने को वे जगन्नाथपुरी में पाई, ईश्वर को उन्होंने कृतज्ञता पूर्वक स्मरण किया औरखिचड़ी का प्रथम भोग लगाने सीढियों की ओर बढ़ी। भगवान के मंदिर में उस समय पूजा हो रही थी। सीढ़ी पर पुजारी ने टोका। भक्त माता कर्मा ने कहा कि "मैंभगवान को खिचड़ी का पहला भोग लगाने बहुत दूर से आई हूँ, मुझे अन्दर जाने दीजिये"। पुजारी के माथे पर बल पड़ गए- "चल दूर हट" और एक धक्का भक्त माताकर्मा को दिया कृशकाय, थकी मंदी भक्त कर्मा माता दूर जा गिरी और फूट- फूट कर रोने लगी। भगवान! आप केवल पुजारियों की मर्जी में ही नज़र बंद कैद क्यों हैं क्याआप को सुनहले सिंहासन ही पसंद हैं? आकाशवाणी हुई- "नहीं कर्मा, मैं तो महज प्रेम का भूखा हूँ। मैं खुद मंदिर से निकल कर तुम्हारे पास आता हूँ" मठाधीशों मेंहड़बड़ी मच गई, भगवान कृष्ण कर्मा के पास आये और बोले- कर्मा देखो मैं तुम्हारी खिचड़ी खा रहा हूँ। भक्त कर्मा प्रेम से भगवान को खिचड़ी खिलाने लगी। उन्होंनेभगवान से वर माँगा-"इसी तरह आप प्रतिदिन खिचड़ी का भोग लगाया करें और मैं बहुत थक चुकी हूँ- आपके चरणों में मुझे जगह दीजिये" -यह कहकर भक्त माताकर्मा भगवान के चरणों पर गिर गई और परमधाम को प्राप्त हुई .
लेखक- स्व. डॉ. मनराखन लाल साहू ,
नेहरु नगर, भिलाई (छत्तीसगढ़)

Tuesday, August 3, 2010

मन मयूरा


मन मयूरा थक रहा बादल घनघोर
आँखें देखती इस ओर तो कभी उस ओर

गरजती हुई घटा और चमकती सी बिजली
उस पर फिर चलते हुए पवन का शोर
व्याकुल ह्रदय एक ख्वाहिश संजोती रही
कि रिमझिम बूँदें बरसें इस छोर

साथ बारिश के बादल भी खींच लूं
अगर बना लूं अम्बर से धरती तक डोर

हौले- हौले टपकती मोतियों सी बूँदें
ये मौसम बन रहा धरती का सिरमौर

हर्षित हो कर नृत्य में मग्न हूँ
समस्त वातावरण हुआ आनंद विभोर
यह रचना हमारे एक मित्र नईम जी के ब्लॉग "हज़ार अशार" से ली गई है...
(
http://nayeemnahi.blogspot.com/)

Friday, May 7, 2010

पानी




पानी बहती जाती है
पानी प्यास बुझाती है
आँखों से होकर
मन को हल्का कर जाती है

कभी बादलों से फिर
खेत में फसल लहलहाती है

यही सागर भी है जहाँ
सीप में ढल के मोती बन जाती है

यही कश्तियाँ, नाव और जहाज को
दरिया से मंजिल तक पहुंचाती है

कभी सर्द बर्फ है कभी गर्म भाप
ये हर शै में खुद ढल जाती है

पानी इसका कोई रंग रूप नहीं
फिर भी जिन्दगी का जरिया बन जाती है

पानी इसकी हर बूँद की कीमत है
किसी किसी को ही ये समझ आती है......

यह रचना हमारे एक मित्र नईम जी के ब्लॉग "हज़ार अशार" से ली गई है...

Tuesday, March 23, 2010

रोशनी के टेपरिकॉर्ड की व्यथा


एक जमाना था जब मोहल्ले में हमारे ही टेपरिकॉर्ड (जी पापा जी के ज़माने की थी) उसका ही राज था वह मीठे मीठे गाना गाता था और हम सब आनंद लेते थे। तभी एक दिन अचानक उसका प्रतिद्वंदी आ धमका हमारे सामने वाले घर में।

जब वह गाता तो अगल- बगल के कुछ टेपरिकॉर्ड चुप हो शायद आत्मविश्वास में कुछ कमी आ गई थी

एक दिन हमने उसे किसी से बात करते सुना, ओह! यह तो अपनी व्यथा कह रहे हैं उस सामने वाले टेपरिकॉर्ड से! चलिए सुनते यह जनाब क्या कह रहे हैं?

मैं हूँ रोशनी का टेपरिकॉर्ड
लिख रहा हूँ अपना ध्वस्त रिकॉर्ड
यहाँ स्थिति मेरी ठीक नहीं है
ऊपर मेरे धूल की पर्त जमी है
ये रोशनी की बच्ची
मुझे साफ नहीं करती सच्ची मुच्ची
उसके पापा अभी दिल्ली गए थे
तीन चार दिन के लिए ठहर गए थे
मत पूछो क्या खरीदारी की Man
ले आये उसके लिए एक वॉकमैन
बस कान लगाकर सुनते रहती है उसे
हाल मेरा क्या होता है मालूम नहीं उसे

आपका ख्याल तो बाबू मोशाय रखते होंगे
आप हालत में लाख गुना बेहतर होंगे
ध्वनि नियंत्रक ठीक नहीं हो पाता
गाना ऊँचे स्वर में गा नहीं पाता
कभी कभी धुनाई हो जाती है मेरी
पेंच सारी गायब है मेरी
बस किसी तरह जिन्दा हूँ
काले टेप व सेलुटेप की मदद से सही सलामत हूँ
वैसे भी अब बुढ़ा गया हूँ
उसे क्या दोष दूँ, बस अब एक ही गीत गाता हूँ
"जाने कहाँ गए वो दिन, बजता था मैं रात और दिन..."।

Wednesday, February 10, 2010

"बसंत आया धरती पर "




लाल, पीले, नीले और नारंगी
आभा बिखेरते हुए किया श्रृंगार, धरती का
मानो इन्द्रधनुष आया उतर धरती पर

हँसते मुस्कुराते तुम्हारी पंखुड़ियाँ
मानो स्वर्ग उतर आया ज़मी पर

मधुरस लेने आई कुछ सखियाँ
अब आई बारी परिश्रम की

बिरह के दिन ख़त्म हुए सखी
आई बहार धरती पर

महका दिया तुमने धरती को
बसंत आया धरती पर

Monday, January 25, 2010

वन्दे मातरम!!

जब भी गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस का दिन करीब आने लगता है तो जैसे ये वक्त ठहर गया हो कुछ पलों के लिए। हाथ कुछ कर नहीं पाते, आँखें नम हो जाती है, हृदय भर आता है उन शहीदों के लिए जिन्होनें अपने प्यारे देश भारत अपनी मातृभूमि के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया .......
आज़ाद भारत में जन्म लेने से हम वह ज़ज्बात महसूस करने से वंचित रहे और हमेशा रहेंगे ........
पर आज भी कई जगह है जैसे अंडमान निकोबार की सेलूलर जेल, जलियावाला बाग़ (अमृतसर) जहाँ की दीवारें और गलियां आज भी एक जोश में चीख चीख कर कह रही हैं.....
वन्देssss....... मातरम!





वन्देssss....... मातरम!






वन्देssss....... मातरम!

अरिष्टासुर वध....


खुरते खुरदि महि धुरि, पुच्छ उठाय मेघ करी दूरी
आगे करिदोऊ विषम विषाणा, अति फ़ुफ़कार करत बलवाना।
वेगि चला यदुवर पर ऐसे, इन्द अशिन पर्वत पर जैसे
झट गहि उभय सींग बनवारी, कुछ ठकेलि ले गयो पछारी।
ठेल पेल दोऊ ओर करारे, लड़हि यथा युग गज मतवारे ।

संकलन -कवि श्री हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’की रचना से


(श्यामायण, पृ० २३५)