Wednesday, December 30, 2009

आप सभी को नव वर्ष 2010 की हार्दिक शुभकामनायें.........


एक निरंतर
मधुर
अमर संगीत
क्या आपने सुना?


एक शंख
एक सितार
एक तबला
सभी झूम रहे हैं
क्या आपने देखा?

ख़ुशी
सफलता
समृद्धि
आपके राहों पर बिछें हैं
क्या आपने महसूस किया?
.
संगीत
समय के एक अनजान क्षण से आ रही है
क्या आप जानते हैं?

जी हाँ.....
यह आ रही है...नव वर्ष २०१० से ...
आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें.........

A continuous
Melodious
Immortal musical sound
Do you hear?

A conch
A sitar
A tabour
All in motion stage
Do you see?

Delight
Success
Prosperity in your way
Do you feel?

Music
comes from unknown part of the time
Do you know?

Yes ...this music comes from
coming new year 2010
WISH YOU ALL A VERY HAPPY NEW YEAR

Friday, December 18, 2009

"सतगुरु कबीर जी"



कक्का केवल ब्रम्ह है, बब्बा बीज शरीर।

रर्रा सब में रम रहा, ताका नाम कबीर॥


जो तू चाहे मुझको ,छाँड़ सकल की आस।

मुझ ही जैसा हो रहो, सब सुख तेरे पास॥

Friday, December 4, 2009

सोने भी दो हमें..



अमा यार ये दो पल मिले हैं आराम भी करने दो हमें ....फ़िर बहुत सारे काम है ...संजय जी के घर से दूध चोरी करनी है , नीरज जी के घर में सुना है एक आतंकवादी... नहीं समझे ! एक मोटा-ताज़ा चूहा आया है उसे पकड़ना है और क्रिएटिव मंच के घर भी जाना है क्यों? यह एक रहस्य है .....

Saturday, November 28, 2009

"मेरे सपने पूरे होंगे?..."



ओ नन्हीं सी प्यारी गुड़िया क्या सोच रही हो?
...
...
उड़ते पंछियों को देख रही हूँ.....

देखो!.. कैसे मजे से आसमान में उड़ रहे हैं....मैं भी उन जैसा उड़ना चाहती हूँ.....

सारी खुशियाँ समेट कर अपनी झोली में रखना चाहती हूँ.....

और देखो उधर बच्चे कैसे खेल रहे हैं कितनी शैतानियाँ भी कर रहें है हा हा हा ....
मैं भी उनके साथ खेलना चाहती हूँ.....
और उन्हें देखिये उन बच्चों को मिट्टी से कुछ बना रहें हैं ...मैं भी मिट्टी से अपना घर बनाऊंगी, फूलों से अपना प्यारा घर सजाऊंगी.......
और हाँ मेरी एक छोटी सी प्यारी सी गुड़िया भी होगी उसकी शादी भी करुँगी.......
क्या ऐसा हो पायेगा?
उधर देखिये सारे बच्चे पाठशाला जा रहें हैं!
......क्या मुझे भी जाने मिलेगा?......
दीदी.... अभी मैं जाती हूँ,.. आप से फ़िर कभी बात होगी अभी मुझे माँ के साथ काम पे जाना है ना ...

Friday, November 20, 2009

"राधा और कृष्ण...."

मुरली की मधुर तान से समस्त वातावरण गूंज उठा। प्रेम व करुणा रस से भरे इस ध्वनि से अत्यधिक विचलित होने वाला मन राधा का था।

आप ही उसके कदम धुन की दिशा की ओर बढ़ने लगे। प्रेम में डूबी राधा मुग्ध अवस्था में ही मुरलीधर के चरणों को अपने कोमल हाथों से पकड़े अपना माथा लगाया, नैनों से अविरल बहते गंगा जल सी पवित्र अँसुअन से उनके चरण भिगोये।

मुरली बजाने में तल्लीन कृष्ण ने धीमे से अपने अपने नैनों को खोला, समीप राधा को चरणों में देखकर मन भावविहल हो उठा। हाथों से राधा को उठाया व गले लगाया तो ऐसा लग रहा था प्रकृति और उनके प्रेम एक दुसरे में समां गए हों।

उनके प्रेम से सारा संसार अविभूत है उनके पवित्र प्रेम पर कोई भी उंगली नहीं उठा सकता , प्रेम एक आत्मा का दूसरी आत्मा से था ना की एक शरीर का दुसरे शरीर से था।

Wednesday, November 18, 2009

अहोभाग्य...

अहोभाग्य हमारा नीरज जी ! कि इस गरीब की कुटिया में आपने कदम रखा। क्या लेंगे ?
गुस्ताखी माफ़ हो अगर बन्दे से मेहमाननवाजी में कोई कमी रह गई हो!
आपका बहुत बहुत शुक्रिया .....
आपका मार्गदर्शन हमें मिलता रहे ....इस आशा के साथ आपका पुन: शुक्रिया!

Sunday, November 15, 2009

मुझे भी खुश रहना है ...."



मुझे भी जीने दो


बादल हूँ बरसने दो


कलि हूँ खिलने दो


फूल हूँ महकने दो


रंग हूँ बिखरने दो



Monday, October 26, 2009

"आभार"

संजय जी और रुद्र प्रताप सिंह जी आप दोनों का बहुत बहुत शुक्रिया।

Saturday, October 24, 2009

गजराज की मस्ती

video

"इठलाती तितलियाँ रानी"










कितनी प्यारी लग रही हो तितली रानी,
तुम्हारा इठलाना, मंडराना
इन फूलों की खूबसूरती को बढ़ा रही है।
तुम हमेशा
खुश रहो मेरी प्यारी तितली रानी।





"जीवन"


Sunday, October 11, 2009

नटखट कन्हैया



जमुना नदी में नहाती गोपियों के वस्त्र हरण कर नटखट कन्हैया जी कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ गए हैं। गोपियाँ अपने वस्त्र ढूँढ़ती है व क्रोधित होती हैं तत्पश्चात थक हार के कन्हैया जी से अपने वस्त्र मांगती हैं।


अध्यात्म में इसका अर्थ यह हैं कि "आत्मा अपने सांसारिक मोहमाया का त्याग कर अपने प्यारे प्रभु से मिलती है।"

Wednesday, October 7, 2009

"एक बात और..."



दोस्तों एक बार फ़िर से मैं आपके बीच हूँ !
पता है आज मेरी मम्मी एक गाना गा रही थी मेरे लिए ...
चंदा है तू , मेरा सूरज है तू
तू मेरी आंखों का तारा है तू......
बहुत अच्छा लग रहा था मुझे ...


हा हा हा हा ....हँसी आ गई मुझको , क्यों ? मेरी बड़ी मम्मी ना हमेशा मुझको ये सुनाती है....
मैं आप लोग को सुनाऊँ ?
बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी,
कहो कहाँ से आई हो?
कितने चूहे मारे तुमने,
कितने खा के आई हो?
क्या बताऊँ ........शीला माई....
आज नही कुछ पेट भरा
एक ही चूहा पाया मैंने
वो भी बिल्कुल सड़ा हुआ!

जब मैं ऐसे गाना सुनाऊंगा ना तो कितना मजा आएगा है ना?
अभी तो मैं बोल नहीं सकता ना ....बस हँसता हूँ और किलकारियां मरता हूँ ......
एक बात बताऊँ आप लोगों को ?

मेरे पापा ना दिवाली त्यौहार में आ रहें हैं मुझसे मिलने। कितना मज़ा आएगा।
आप लोगों को भी मेरी ओर से दीपावली की बहुत बहुत बहुत .........सारी हार्दिक बधाइयाँ......

आपका प्यारा आदित्य

"आदित्य"



मेरे प्यारे दोस्तों ,

संजीव मामा जी, हितेंद्र मामा जी , श्यामल सुमन मामा जी, श्याम जी, हेमंत चाचा जी , मनोज अंकल जी, विश भाई, चंदन मामा जी , Gatharee ji, क्रिएटिव मंच, आमीन जी,नईम मामू और मेरे प्यारे नारद मुनि नाना जी,

आप सभी के आर्शीवाद से ना , मेरी तबियत सुधर रही है।

आप सभी को मेरा आभार।

Saturday, October 3, 2009

"प्रेम"

प्रेम जैसा विषय का चुनाव, आज के समय में आम हो चुका है। प्रेम शब्द इतना रस भरा होता है कि सारा संसार इसमे डूब कर आनंद के बहुमूल्य मोती प्राप्त कर सकते हैं। प्रेम सभी हथियारों में सबसे सर्वोच्च गुण वाला ताकतवर तलवार है इसके आगे कोई हथियार उठ नहीं पाता। यह सभी को धराशायी कर देता है। कवि प्रेम रस की कल्पना में डूब कर अनेक ऐसे कविताओं को जन्म देते हैं जिससे हम भी प्रेम के विभिन्न रूपों को समझ पाते हैं। प्रेम शब्द का अर्थ हर एक व्यक्ति के दृष्टिकोंण में अलग अलग होता है।



प्रेम कई स्वरूपों में हमें नज़र आते हैं जैसे माँ कि ममता, ईश्वर के प्रति, बच्चों का अपने परिजनों के प्रति, भाई बहन का स्नेह और नागरिक का अपने देश के प्रति। परन्तु मैं जिस प्रेम के स्वरूप कि बात कर रही हुँ वह है "युवा वर्ग " का प्रेम। युवावस्था में हर व्यक्ति इस अनुभव से होकर एक बार गुजरता है। समय के चक्र ने मुझे भी ऐसे ही मोड़ पर ला छोड़ा था।मैंने इसके पहले इस विषय पर इतना गंभीर चिंतन नहीं किया था। अपने युवा साथियों से मैंने इस पर चर्चा की तो मुझे उनके विचार पता चले। इनमे से कई अपने परिजनों की परवाह किए बिना शादी करने का विचार रखती थी तो कई अपने प्रेमी को न पा सकने की स्थिति में आत्महत्या जैसे रास्ता चुनना पसंद करती थी। कई प्रेमी अपने प्रेमिका को प्रेम के नाम पर कलंकित जीवन जीने को मजबूर कर देते हैं और कई प्रेमिका को अपनी न होते देख उसे नुकसान पहुँचाने की अपराधिक कोशिश करते हैं। क्या यही है आजकल के युवाओं के प्रेम का स्वरुप ?
इस कलयुग में प्रेम के इस स्वरूप को देख मैंने इसकी गहरे में जाकर इसके अर्थ को समझने का प्रयास किया। सदियों से यह कहा जाता रहा है और आज भी , कि युवाओं के प्रेम के राह में सबसे बड़ी बाधा इनके परिजन होते हैं , तत्पश्चात समाज और धर्म। अमीरी और गरीबी भी प्रमुख बाधाओं में गिना जाता है।
जब कोई एक इन्सान से प्रेम करता है तो इसमे किसी तीसरे व्यक्ति को कदाचित आपत्ति नहीं होगी जब तक मन में ईर्ष्या की भावना या किसी अन्य प्रकार का द्वेष न हो।
क्या कोई माँ बाप अपनी औलाद के प्रति किसी प्रकार का ईर्ष्या व द्वेष की भावना रखेगा ? इसी प्रकार एक परिवार से अन्य परिवार प्रेम का भाव रखता है और कई परिवार व धर्म के लोग मिलकर एक समाज का संगठन करते हैं और एक संगठन दुसरे संगठन से प्रेम व एकता का भाव रखते हुए देशभक्ति व एकता का परिचय देते हैं तो इसमें भला जब एक युवा प्रेमी या प्रेमिका द्वारा किसी दुसरे युवा प्रेमिका या प्रेमी से प्रेम किया जाता है तो दुसरे वर्ग को क्या परेशानी हो सकती है? मेरे विचार से किसी भी वर्ग को इससे कोई आपत्ति नही अगर उन्हें आपत्ति है तो वह है युवाओं के प्रेम के अर्थ का ग़लत रूप में लेने व् इस्तेमाल करने से।
जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो क्या उससे शादी जैसे रस्म में बंधना जरुरी होता है? क्या मात्र यही रास्ता है प्रेम दर्शाने या प्राप्त करने का?
और यदि आप उसे पा न सके तो आप उसे नुकसान पहुचने की कोशिश करते हैं यह प्रेम का कैसा स्वरूप है?
शादी के रस्म से बंधने के बाद वे सुखी नही रहते और बात तलाक़ तक आ पहुँचती है शायद यह प्रेम का एक और दृश्य है, है ना?
आख़िर आप प्रेम किस्से करते हैं शरीर से या आत्मा से?
अगर आपका उत्तर है आत्मा से तो आप पाने की इच्छा क्यों रखते हो? क्योंकि आत्मा शरीर की मृत्यु के बाद दूसरा शरीर धारण कर लेती है या तो दिव्य रूप में रहती है। आत्मा का रूप दिखाई तो नही देता सिर्फ़ शरीर ही दिखाई देता है और आपकी आँखे सिर्फ़ युवा शरीर को ही देख पाती है ना कि उसके आत्मा को नही तो आप किसी प्रौढ़, कुरूप और कोढ़ी की तरफ़ क्यों आकर्षित नही होते?
खैर, हर प्रेमी प्रेमिकाओं को यह खुशनसीबी प्राप्त नही होती की उनके परिवारजनों की सहमती उनके शादी को लेकर हो। तो उन्हें इससे जरा सा भी निराश होने की जरुरत नही उन्हें अगर जरुरत है तो वह, सिर्फ़ प्रेम को विस्तृत रूप में देखने की। आप जिससे भी प्रेम करते हैं उससे शादी करने में आपके परिवारवालों को एतराज़ है मगर मदद करने में तो नही ना?
आप उसकी हर तरह से, हर रूप में चाहे वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हो मदद करिए उसे हमेशा खुश रखने की कोशिश करिए। सिर्फ़ उनकी ही नहीं उनके पूरे परिवार वालों की मदद कीजिये उनको पुरा सम्मान दीजिये। जब वह खुश होंगी या होंगे तो फ़िर देखिएगा आप अपने आप को लगेगा की आपने सब कुछ पा लिया। आप किसी प्रकार की अपेक्षा मत रखिये सिर्फ़ मदद करते जाइये जब तक आप संतुष्ट नहीं हो जाते।

आप जैसे कई अन्य लोग भी होंगे जो अपने प्यार को हमेशा खुश देखना चाहते हैं वे सब मिलकर एक ऐसा संगठन का निर्माण करें जिसमे सभी आपस में मिलजुल कर /एक जुट होकर ऐसा कार्य करें ताकि देश का नाम उँचा हो।
जब आपके मन में एक दुसरे के लिए प्रेम की भावना है तो जाहिर है आपका कार्य अधिक मन से किया जायगा , बिना किसी ईर्ष्या व द्वेष के और समर्पित भाव से होगा जिसका परिणाम सुखद होगा क्योंकि जहाँ प्रेम है वहां ईश्वर है।
इससे आकर्षित होकर और भी आयेंगे आपके कार्यों में भागीदार बनने क्योंकि उन्हें प्रेम के रहस्य का पता चल चुका होगा। इससे दुसरे देशों जैसे पशिमी देशों का ध्यान भी जरुर आएगा वे इसे समझने की जरुर कोशिश करेंगे की "प्रेम में त्याग की भावना होती है। "
हमें पश्चिमी देशों का अनुकरण नहीं करना बल्कि उनका मार्गदर्शक बनना होगा।
हमारा देश पहले भी प्रेम को अलग दृष्टिकोण से देखता था इसका कारण उनकी आध्यात्मिक दृष्टि थी। आज के युवाओं को फ़िर से इस विषय पर गंभीर चिंतन करते हुए इसकी परिभाषा को या इसके महत्व को समझते हुए दुनिया को यह बताना होगा की हमारा भारत पहले भी महान था और आगे भी रहेगा।

Thursday, October 1, 2009

श्रद्धांजलि


एक श्रद्धांजलि दादा जी को समर्पित है
उनके पोते और पोती के
प्यार के संगीत से।

Wednesday, September 30, 2009

नारी और सृजनशीलता



अलख पुरूष जब किया विचारा
लख चौरासी धागा डारा
पञ्च तत्व की गुदरी बीनी
तीन गुणन की ठाढ़ी किन्ही
ता में जीव ब्रम्ह औ माया .....


(कबीर उपासना से संकलित)

Saturday, September 26, 2009

आदित्य


मैं ना आदित्य साहू हुँ ...क्या आप मेरी कहानी सुनोगे?
मेरा जन्म १० मार्च २००९ में होलिका दहन के दिन हुआ था।
मेरे मम्मी पापा उस क्षण बहुत खुश थे पर थोड़े देर में यह खुशी दुःख में बदल गयी। मैं रोया नहीं ना तो ऑक्सीज़न की कमी हो गयी।
और न मुझे मेनेंज़ाइटिस भी हो गया।
मुझे दुसरे हॉस्पिटल ले जाया गया।
मैं अपनी मम्मी से अलग आई.सी.यू.में था। मम्मी दुसरे हॉस्पिटल में और मैं दुसरे।
मुझे अपनी मम्मी की बहुत याद आती थी। नर्स मुझे जब कैन्डूला लगाती ना तो बहुत दर्द होता था। मेरे नाक में पाइप लगी थी , अब तो झटके भी आने लगे थे। किसी को भी मेरे बचने की उम्मीद नही थी सिवाए मेरे मम्मी के।
जब वह मुझसे मिलने आती तो ना मुझसे अपनी आखों से कहती -
"मेरा प्यारा बेटा, तू जल्दी से अच्छा हो जाएगा।"
पता है ? इसलिए मैं जल्दी से ठीक होने लगा। मैं करीब डेढ़ महीने हॉस्पिटल में रहा।
खूब सारी दवाईयाँ लेनी पड़ती थी खूब उल्टी भी हो जाती थी।
डिब्बा वाला दूध लेना पड़ता जो मुझे बिल्कुल पसंद नही आता था।
पर अब मैं गाय का दूध लेता हूँ रोज १ से डेढ़ लीटर पी जाता हूँ और ना नानी मुझको रोज एक सेब फल भी देने लगी है
अभी तो मैं ठीक हूँ किंतु कभी -कभी मुझे अभी भी झटके आते हैं तो मेरी मम्मी डर जाती हैं।
आप लोग ईश्वर से मेरे लिए प्रार्थना करिए ना की मैंजल्दी से अच्छा हो जाऊं .... और मेरी मम्मी से बोलिए की ज्यादा चिंता ना करें अपने स्वास्थ का ध्यान रखें।
और ना मुझे अपने पापा की बहुत याद आती है वे मुझसे बहुत दूर डेल्ही में रहते हैं उनको अपना कार्य छोड़ते नही बनता पर मुझसे बहुत प्यार करते हैं।

मै अभी वहां नही जा सकता क्योंकि मेरी तबियत अभी पूरी ठीक नहीं हुई।

पता है मै अपने पापा के लिए कौन सा गीत गाता हूँ ?

"सात समुन्दर पार से गुड़ियों के बाज्रार से अच्छी सी गुड़िया लाना,

गुड़िया चाहे न लाना, पर पापा जल्दी आ जाना"


I love you mom and dad.

Thursday, September 24, 2009

कृष्ण लीला

कुंवर जल लोचन भरि भरि लैत।

बालक बदन बिलोकि जसोदा कत रिस करति अचेत॥

छोरि कमर तें दुसह दांवरी डारि कठिन कर बैत।

कहि तोकों कैसे आवतु है सिसु पर तामस एत॥

मुख आंसू माखन के कनिका निरखि नैन सुख देत।

मनु ससि स्रवत सुधाकन मोती उडुगन अवलि समेत॥

सरबसु तौ न्यौछावरि कीजे सूर स्याम के हेत।

ना जानौं केहिं पुन्य प्रगट भये इहिं ब्रज-नंद निकेत॥१७॥



(सूरदास जी के पद से )
अर्थ
एक गोपी शायद वही जो उलाहना देने आयी थी कृष्ण को इस तरह बंधन में पड़ा देखयशोदा से कहती है अरी यशोदा तनिक कन्हैया की ओर देख तो।बच्चे की आंखेंडबडबा गयी हैं। क्यों इतना क्रोध कर रही है यह कठिन डोरी कुंबर की कमर से खोल दे और यह छड़ी फेंक दे यह पांच बरस का निरा बच्चा ही तो है। कहीं नन्हें-से बालक पर इतना क्रोध किया जाता है इस समय भी कुंवर कान्हा कैसा सुन्दर लगता है मुख पर आँसुं की बूंदें टपक रही हैं और माखन के कण भी इधर-उधर लगे हुए हैं। ऐसा लगता है जैसे तारां सहित चंद्रमा अमृत के कणों और मोतियों की वर्षा कर रहा हो। यह शोभा भी नेत्रों को आनन्द देती है। यशोदा यह वह मोहिनी मूरत है जिस पर सर्वश्व न्यौछावर कर देना चाहिए। न जाने पूर्व के किस पुण्य प्रताप से नन्द बाबा के घर में आकर इस सुन्दर बालक ने जन्म लिया है।

हरि बिन जियरा मोरा तरसे

























हरि बिन जियरा मोरा तरसे, सावन बरसै घना घोर।
रूम झूम नभ बादर आए,कहूँ दिसी बोले मोर।
रैन अँधेरी रिमझिम बरसै, डरपै जियरा मोर॥
बैठ रैन बिहे सोच में, तड़प तड़प हो भोर।।
पावस बित्यौ जात, श्याम अब आओ भवन बहोर॥
आओ श्याम उर सोच मिटाऔ, लागौं पैयां तोर।....
(खड़ी बोली लोकगीत से संकलित)

आज बिरज में होली है रे रसिया









आज बिरज में होली रे रसिया
होरी है रे रसिया, बरजोरी है रे रसिया। आज
बिरज में ....

इत तन श्याम सखा संग निकसे
उत वृषभान दुलारी है रे रसिया। आज बिरज में....

ब्रत गुलाल लाल भये बादर
केसर की पिचकारी है रे रसिया। आज बिरज में .....

बाजत बीन, मृदंग, झांझ डफली ,
गावत दे -दे - तारी रे रसिया। आज बिरज में ......

श्यामा श्याम मिल होली खेलें,
तन मन
धन बलिहारी रे रसिया,
आज बिरज में होली रे रसिया।

(बृजभाषा लोकगीत से संकलित कविता )