Thursday, September 24, 2009

हरि बिन जियरा मोरा तरसे



हरि बिन जियरा मोरा तरसे, सावन बरसै घना घोर।
रूम झूम नभ बादर आए,कहूँ दिसी बोले मोर।
रैन अँधेरी रिमझिम बरसै, डरपै जियरा मोर॥
बैठ रैन बिहे सोच में, तड़प तड़प हो भोर।।
पावस बित्यौ जात, श्याम अब आओ भवन बहोर॥
आओ श्याम उर सोच मिटाऔ, लागौं पैयां तोर।....
(खड़ी बोली लोकगीत से संकलित)

2 comments:

  1. कृष्‍ण पर साहित्‍य में जो भी लिखा गया है, वो समस्‍त लेखन कृष्‍ण के बहुआयामी व्‍यक्तिव को छूकर बहुआयामी हो जाता है, उस साहित्यिक सोच को रंगों में समेटना बहुत सुन्‍दर विचार है, अपने रंगों में आध्‍यात्मिक अभिव्‍यक्ति के प्रदर्शन को और उभारना निसंदेह आपको जीवन की, कला की गहराईयों में, आनंद में डूबने की और उन्‍मुख करे, ऐसी शुभकामना है।

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  2. Bahut hi behtarin tipani hai apki prajapatimit ji.
    Bahut bahut shukriya.

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