Friday, November 20, 2009

"राधा और कृष्ण...."

मुरली की मधुर तान से समस्त वातावरण गूंज उठा। प्रेम व करुणा रस से भरे इस ध्वनि से अत्यधिक विचलित होने वाला मन राधा का था।

आप ही उसके कदम धुन की दिशा की ओर बढ़ने लगे। प्रेम में डूबी राधा मुग्ध अवस्था में ही मुरलीधर के चरणों को अपने कोमल हाथों से पकड़े अपना माथा लगाया, नैनों से अविरल बहते गंगा जल सी पवित्र अँसुअन से उनके चरण भिगोये।

मुरली बजाने में तल्लीन कृष्ण ने धीमे से अपने अपने नैनों को खोला, समीप राधा को चरणों में देखकर मन भावविहल हो उठा। हाथों से राधा को उठाया व गले लगाया तो ऐसा लग रहा था प्रकृति और उनके प्रेम एक दुसरे में समां गए हों।

उनके प्रेम से सारा संसार अविभूत है उनके पवित्र प्रेम पर कोई भी उंगली नहीं उठा सकता , प्रेम एक आत्मा का दूसरी आत्मा से था ना की एक शरीर का दुसरे शरीर से था।

6 comments:

  1. प्रेम एक आत्मा का दूसरी आत्मा से था ना की एक शरीर का दुसरे शरीर से था।
    लाजवाब पंक्तियाँ

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    जब आत्माएं जुड़ जाती हैं तब बाकी सब चीजें गौण हो जाती हैं

    शुभ कामनाएं



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    क्रियेटिव मंच

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  3. संजय जी और क्रिएटिव मंच बहुत बहुत शुक्रिया.

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